पर्वरीश

श्वेता बरकडे
Friday, 7 June 2019

पता ही नही चला
उम्र कब निकल गयी

पता ही नही चला
उम्र कब निकल गयी
जिम्मेदारियां पुरी करने मे।

बच्चों कि ख्वाहीश
पूरी करते करते
भूल गये हम अपनी
ही ख्वाहीश पुरी करने मे।

बच्चों को खूष देखने
के लिए
उनकी एक हसी के लिए
सारी उम्र बितायी हमने।

और आज वही
बच्चे अपने पैरों
पे खडे हो गये
तो भूल गये है हमें।

सोचा था शायद बनेंगे
वो हमारे बुढापे का सहारा
पर आज शायद शब्द ही
बन गये है हमारे अपने।

बच्चों को देखके
एक ही सवाल मन मे आता है
"हमारे बच्चे गलत है?
या हम ही कम पड गये
उनपर संस्कार करने....??"

 

 

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